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दोस्तों आज फिर मचल के पियो॥

ग़म के साये से अब निकल के पियो॥


ज़िंदगी कल तलक रहे न रहे,

जाम सबसे अदल-बदल के पियो॥


रात मदहोश है नशे में बहुत,

आज फिर बाम पे टहल के पियो॥


आज मौक़ा भी है ख़ुशी भी बहुत,

गाओ नाचो उछल उछल के पियो॥


बैठकर मयकदे में पी है बहुत,

शेख़ मस्जिद में साथ चल के पियो॥


देख “सूरज” भी है उफ़क़ पे खड़ा, 
हो गई है सुबह सँभल के पियो॥


                  डॉ. सूर्या बाली “सूरज”

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